क्यों नहीं रोक पा रही है आरपीएफ रेलवे संपत्तियों का नुकसान

अग्निपथ योजना के विरोध में कुछ राज्यों में हुए हिंसक प्रदर्शन में सबसे ज्यादा नुकसान रेलवे की संपत्तियों को हुआ है, एक अनुमान के अनुसार रेलवे को इस घटना में 700 से 1000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, 60 बोगियों के साथ 11 इंजन आग के हवाले किए गए। इसके अलावा 60 करोड़ से अधिक टिकट निरस्त हुए, 30 से अधिक ट्रेन निरस्त होने से रेलवे को करोड़ों रुपये रिफंड करना पड़ा, यह पहली बार नहीं है, जब रेलवे की संपत्तियों को नुकसान हुआ, इसी साल की शुरुआती दिनों में आरआरबी एनटीपीसी परीक्षा के विरोध में छात्रों द्वारा इसी तरह का प्रदर्शन किया गया था, गुर्जर आंदोलन सहित अन्य कई मौकों पर भी संपत्तियों को नुकसान हुआ।

रेलवे की संपत्तियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (आरपीएफ) की होती है, 65 हजार से ज्यादा आरपीएफ के जवान हैं देशभर में, आरपीएफ के पास अपना इंटिलिजेंस विंग (गोपनीय सूचना तंत्र) होता है, इसके बावजूद आरपीएफ इस तरह की घटनाओं को क्यों रोक नहीं पा रही है? 

तीन साल पहले शुरू हुई थी:- कमांडो ट्रेनिंग रेलवे की संपत्तियों को बचाने के लिए व यात्रियों की सुरक्षा के लिए तीन साल पहले आरपीएफ के जवानों को कमांडो ट्रेनिंग दी जाने की योजना शुरू हुई थी, अधिकारियों के अनुसार यह योजना अभी भी लागू है और जवानों को लगातार ट्रेनिंग दी जा रही है, बावजूद इसके इस तरह की घटनाओं पर रोक नहीं लग सकी है।

आरपीएफ को सीबीआइ जैसे अधिकार दिए जाएं:- आल इंडिया आरपीएफ एसोसिएशन के अध्यक्ष सुनील रेड्डी ने बताया किआल इंडिया आरपीएफ एसोसिएशन लंबे समय से मांग कर रहा है कि आरपीएफ और जीआरपी (गर्वमेंट रेलवे पुलिस) को मर्ज कर दिया जाए, ताकि रेलवे परिसर के भीतर रेलवे संपत्ति की सुरक्षा के साथ-साथ यहां कानून व्यवस्था बिगडऩे से रोक सके और आरोपितों पर कार्रवाई कर सकें- हाल ही में जिन राज्यों में घटनाएं हुईं, वहां जीआरपी ने उपद्रवियों को शहर या रेलवे परिसर और ट्रैक तक आने से रोका होता तो ट्रेनें नहीं जलतीं, रेलवे को असंगठित आंदोलनों से सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है।

10 साल पहले दिया था प्रस्ताव:- भारतीय रेलवे बोर्ड के यात्री सुविधा कमेटी के पूर्व सदस्य नागेश नामजोशी ने बताया कि यह सही है कि आरपीएफ और जीआरपी के बीच में जब तक समन्वय नहीं होगा, तब तक ऐसी घटनाओं पर रोक लगना संभव नहीं है, लगभग 10 साल पहले दोनों को मर्ज करने का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन अब तक इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, हालांकि इससे आरपीएफ की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती है, उसका अपना इंटिलिजेंस विंग होता है, क्या उन्होंने राज्य सरकारों को ऐसी घटनाओं को लेकर अलर्ट किया था।

दो से ढाई करोड़ की लागत:- रेल कोच फैक्ट्री कपूरथला से मिली जानकारी के अनुसार एक एसी कोच की निर्माण लागत 2.5 करोड़ रुपये है जबकि जनरल और स्लीपर कोच के निर्माण में दो करोड़ रुपये का खर्च आता है।

निर्माण में 18 से 20 दिन लगता हैैं :- एक नए कोच के निर्माण में 18 से 20 दिन का समय लगता है। क्षतिग्रस्त या दुर्घटनाग्रस्त ट्रेनों के सुधार कार्य उसी मंडल के रेलवे वर्कशाप में किया जाता है, जिन मंडल द्वारा ट्रेन चलाया जाता है।

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