सैम मानेकशॉ, इस भारतीय फौजी का नाम और काम,पाकिस्‍तान के लिए नासूर जैसा है फिर भी करता है तारीफ!

1971 में पाकिस्‍तान की हार एक ऐसा मुद्दा है जिसका जिक्र आते ही पाकिस्‍तानियों के दिल पर सांप लोटने लगता है. इस युद्ध में भारतीय सेना के सर्वोच्‍च अधिकारी सैम मानेकशॉ ने जो जलवा दिखाया, उसके लिए आज भी पाकिस्‍तानी मीडिया उनकी तारीफ करता है.

पाकिस्‍तान (Pakistan) के नापाक इरादों को नाकाम करने के लिए भारतीय फौज (Indiav Army) ने सीमा पर और सीमा के पार जाकर भी पाकिस्‍तान को सबक सिखाने में भारतीय कोई कमी नहीं छोड़ी. फिर चाहे वो पाकिस्‍तान के घर में घुसकर की गई सर्जिकल स्‍ट्राइक हो या 1971 का युद्ध. ये ऐसी घटनाएं हैं, जिनका जिक्र आते ही पाकिस्‍तान आज भी तिलमिला जाता है. 1971 में पाकिस्‍तान पर जीत दिलाने वाले भारत के सर्वोच्‍च अधिकारी फील्‍ड मार्शल सैम मानेकशॉ (Sam Manekshaw) का आज जन्‍मदिन है. ये वो फौजी हैं, जिनका नाम और काम पाकिस्‍तान के लिए आज भी नासूर की तरह है.

पाकिस्‍तानी मीडिया करता है तारीफ

फील्‍ड मार्शल सैम मानेकशॉ ऐसे फौजी हैं, जिन्‍होंने भारत-पाकिस्‍तान के युद्ध (India-Pak War) में दुश्‍मन को करारी हार देकर हमेशा का दर्द दे दिया. जब भी 1971 के युद्ध की बात आती है तो पाकिस्‍तानी मीडिया (Pakistani Media) में हमेशा यही खबरें होती हैं कि इस युद्ध में पाकिस्तान की हार की बड़ी वजह जनरल मानेकशॉ ही थे. शॉ का जज्‍बा और इच्‍छाशक्ति ऐसी थी कि जब तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सैम मानेकशॉ से युद्ध की तैयारियों के बारे में पूछा तो उन्‍होंने जवाब में कहा था, ‘मैं युद्ध के लिए हमेशा तैयार रहता हूं.’ बस, फिर इसके बाद युद्ध हुआ और भारत ने उसमें पाकिस्‍तान को करारी शिकस्‍त दी.

खाईं थीं 7 गोलियां

3 अप्रैल 1914 को अमृतसर में जन्‍मे सैम मानेकशॉ ने कुछ समय तक मेडिकल की पढ़ाई की और फिर अपने पिता के खिलाफ जाकर जुलाई 1932 में भारतीय सैन्य अकादमी में दाखिला ले लिया. 2 साल बाद ही वे 4/12 फ्रंटियर फोर्स रेजीमेंट में भर्ती हो गए. कम उम्र में ही उन्हें युद्ध में शामिल होना पड़ा. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सैम के शरीर में 7 गोलियां लगी थीं. सबने उनके बचने की उम्मीद ही छोड़ दी थी, लेकिन वे जिंदगी से जंग जीते और बाद में देश को भी कई युद्धों में जीत दिलाई.

निधन पर पाक मीडिया ने छापा था विशेष लेख 

सैम मानेकशॉ 1969 में भारत के सेना प्रमुख बने थे और इसके 2 साल बाद ही 1971 का भारत-पाक युद्ध हुआ था. यहां तक कि द डॉन अखबार ने 2008 में जनरल सैम मानेकशॉ के निधन पर एक विशेष लेख भी प्रकाशित किया था. जिसमें कहा गया था कि सैम मानेकशॉ कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे. हमें भारी मन से यह स्वीकार करना होगा कि 1971 में पाकिस्तान की सेना के खिलाफ भारत को बड़ी जीत दिलाना उनकी बड़ी उपलब्धि थी. तब हमने पूर्वी पाकिस्तान को गंवा दिया था, जो बाद में बांग्लादेश बना. 

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