रेलवे के पास पेंशन देने के लिए पैसे नहीं, पत्रकार बोले- नून-रोटी खाओ, मंदिर का घंटा बजाओ

मोदी सरकार की निजीकरण की नीतियों से लगभग हर सेक्टर बर्बादी के कगार पर हैं। जिस रेलवे को देश का सबसे बड़ा रोजगार दाता विभाग माना जाता था अब वहां भी तरह-तरह के आर्थिक संकट दिखने लगे हैं।

इसपर भले ही टीवी और अखबार वाले पत्रकार बोलने और लिखने से बच रहे हैं लेकिन सोशल मीडिया पर जमकर लिखा जा रहा है।

इसी के मद्देनजर फेसबुक पर गिरीश मालवीय लिखते हैं-

रेलवे के 15 लाख रिटायर कर्मचारियों को पेंशन देने के लिए रेलवे बोर्ड को हर साल 53,000 करोड़ रुपये चाहिए होते है और यह उनके पास नही है इसलिए इस साल पेंशन मिलनी मुश्किल नजर आ रही है।

अब यह कहा जा रहा है कि कोरोना काल की वजह से यह मुश्किल आ रही है लेकिन आप कल छपी खबर को ध्यान से पढ़ेंगे तो पाएंगे कि पिछले वित्त वर्ष 2019-20 में भी पेंशन फंड में 53,000 करोड़ रुपये पूरी तरह से नहीं दिए गए थे।

इस फंड में करीब 28,000 करोड़ रुपये का निगेटिव क्लोजिंग बैलेंस था। अब तो कोरोना की वजह से स्थिति ओर भी बिगड़ गई है।

वैसे भी जितने फायदेमंद रुट है जिसकी वजह से रेलवे अपना खर्चा चलाता था उन रूटों पर तो प्राइवेट ट्रेंन चलाने की अनुमति दे दी है तो अब खर्चा निकलना तो वैसे ही मुश्किल है।

दरसअल रेलवे को BSNL की लाइन पर धकेला जा रहा है BSNL के कर्मचारी जैसे स्वेच्छिक़ सेवानिवृत्त होने की योजना जल्द ही रेलवे के लिए आने वाली है. पर पैसे मिलना तब भी मुश्किल है इसलिए अब BSNL जैसे ही रेलवे की बेशकीमती जमीनो को ठिकाने लगाया जा रहा है।

जब BSNL के जैसे रेलवे के भी निगमीकरण के प्रयास किये जा रहे थे तब भी रेलवे कर्मचारी नहीं समझे खुलकर उन्होंने मोदी सरकार को मंदिर बनाने के लिए वोट दिया और मंदिर तो बन रहा है अब पेंशन मिले न मिले उन्हें फर्क ही क्या पड़ता है, नून रोटी खाइए ओर मंदिर का घण्टा बजाइए।

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